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क: पंथ: ? कौन सा पंथ?

लुकाईजाह : जब मैं सत्य की खोज पर निकला तो मैंने ट्राई किये मैक्सिको के magic mushrooms, अमेज़न जंगलों की plant medicine healing, इजिप्ट की नाइल नदी में बप्तिस्मा, बड़े -बड़े पिरामिडों में ध्यान- साधना, थाईलैंड और जापान में बौद्ध- साधना, IAM University के अध्यापकों के साथ आत्मशोध, हवाई में डॉलफिन के साथ तैराकी, मायन संस्कृति के पंडितों के साथ यज्ञ-हवन, अमरीका में sweat lodges, कुण्डलिनी जागरण, Jose Silva mind control Technique, NLP Swish Pattern,Self-hypnosis, Hypnotherapy,EFT…

मैं यह तो नहीं कहूँगा कि यह सब तकनीकें एकदम बे-सर-पैर कि और समय बर्बाद करने वाली थीं। हर पद्धति कि अपनी एक भूमिका थीं, कुछ-न-कुछ फायदा था। लेकिन मै जिस श्रेष्ठ और उम्दा फायदे को पाने निकला था, वह मुझे इनमे नहीं मिला। बेशक इनमें से कई तकनीकों ने मेरे तन को चंगा रखा, कई ने मेरे मन को स्वस्थ और शांत रखने में मदद कि, कई ने मेरे दिमाग या बुद्धि तक को तेजस्वी बनाया। पर इनमें से किसी भी तकनीक कि पहुँच मेरी आत्मा तक नहीं थीं। इन तकनीकों के अनुभवों को पाकर मैंने कभी पूर्ण तृप्ति महसूस नहीं क़ी। एक अधूरापन … एक टीस मेरे अंदर हमेशा बनी रहती। मेरी रूह बेचैन विरहणी होकर कुछ बेहतर तलाश रही हो।

लेकिन जब मैंने ब्रह्मज्ञान की दीक्षा पाई, तो मेरी चेतना साफ-स्पष्ट हुंकार भर कर कह उठी-’लुकाईजाह!आखिर तुझे रास्ता मिल गया- पूर्ण! शाश्वत रास्ता! इससे बढ़कर संसार में कोई ध्यान-साधना नहीं हो सकती!!

… वो कौन सी तकनीक है जो उस पारलौकिक ईश्वर को आपकी दिव्य आँख के सामने ला खड़ा कर सकती है ?

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सुईं बिन धागे के नहीं सिलती!
साईं बुल्लेशाह के मन में कौतुक करने की सूझी। दरअसल, वे दर्ज़ी को इबादत का सच्चा मर्म बतलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने दर्ज़ी की गोद में बिखरा कपड़ा, जिसे वह पहले तुरप रहा था, उठा लिया। उस कपड़े में धागा पिरी एक सुईं भी थी जिसे उन्होंने निकाल दिया। फिर बड़ी एकाग्रता से उस बिन धागे की सुईं को कपड़े के आर-पार…आर-पार घुसाने लगे।
दर्ज़ी तपाक से बोला-’साईं ,कैसी बच्चों जैसी बात करते हो? बिना धागे के अकेली सुईं कैसे सिलेगी? पहले इसमें धागा तो डालो!’ अब साईं बुल्लेशाह के बोलने की बारी थी। वे भी उसी लय में झट बोले-’यही तो मैं भी तुम्हें बतलाना चाहता हूँ, मियाँ-जिचर इश्क-मजाज़ी लागे, सुई सीवे न बिन धागे॥ जैसे एक सुईं बिना धागे के नहीं सिलती, वैसे ही इश्के-मजाज़ी (गुरु-भक्ति) के बिना इश्के-हकीकी( प्रभु-भक्ति) कभी नहीं मिल सकती। मुर्शिद का रहमोकरम(दया), इल्मो-ज्ञान(ब्रह्मज्ञान) जब खुदा की इबादत से जोड़ता है, तभी बात बनती है। कपड़े में खाली सुईं चलाना बेकार है…
चटपटे चुटकलों में लिपटा सार!
माडॅर्न दादू माडॅर्न पोता फिल्म देखने सिनेमाघर गए। फिल्म के बीच
पोता - दादू, आप ज़मीन पर क्या कर रहे हो? अपनी सीट पर क्यों नहीं बैठे हुए?
दादू- श ऽ ऽ ऽ, चुप!
पोता- आपकी वजह से सब डिस्टर्ब (परेशान) हो रहे हैं। घूर-घूर कर यहीं देख रहे हैं। चलिए,सीट पर आइए।
दादू-अरे समझो, मैं कुछ ढूँढ़ रहा हूँ।
पोता-क्या?
दादू- टॉफी।
पोता- टॉफी!!!एक टॉफी के लिए इतना तमाशा! चलिए, आइए मैं आपको दूसरी दिला दूँगा।
दादू- नहीं, मुझे वही टॉफी चाहिए।
पोता-क्यों?
दादू-क्योंकि उसमें मेरे दाँत भी चिपके हुए हैं।
सार:साधकों,हम भी कई बार सेवा छोड़ देते हैं, छोटी-सी टॉफी समझ कर। यही सोचकर-’क्या हुआ यह सेवा नहीं कर पाए तो। दूसरी कर लेंगे। पर हम नहीं समझ पाते कि हमने केवल सेवा नहीं छोड़ी, बल्कि उसके साथ लगा बहुत कुछ छोड़ दिया-हमारा कल्याण, उत्थान, विकास! इसलिए किसी भी सेवा को छोड़ने कि भूल न करें। हमारा हित इसी में हैं!

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